https://www.youtube.com/watch?v=rmdfgNnA78s
गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017
शनिवार, 4 फ़रवरी 2017
--पप्पू त रावणेकि सेना में जाल् --
--पप्पू त रावणेकि सेना में जाल् --
रामलीलक मौसम आते ही मांङण चंद शुरू,धंद शुरू और कटण बंद
शुरू हैजाँ। हमार् शहर में पैली एक रामलील हैंछि,अच्याल हर मोहल्ल में हैं।
सबनैकि अलग-अलग रामलीला कमेटी। हर कमेटीक अलग-अलग चुनाव। चुनावाक् लिजी हर
साल महाभारत। सुणन में ऊना यौ बार रामलील कमेटीक पैलियाक् अध्यक्षल् ऐलाक
अध्यक्षाक मलीबै चंद में घपाल करि घोटालक लांछन् लगैबेर भौतै बबाल करौ।
ऐलाक वर्तमान अध्यक्षल् लै पैलियाक अध्याक्षाक ऊपर आपण टैमक घोटाल् कैं
देखणैकि सीख दी दे। द्वीयानै एक-दुहार कैं खुल्याम सड़क में चप्पलै-चप्पल
चपल्या। उनन धैं के न कई जै सकींन,किलैकि राम नामेकि लूट छ। लुटि सकछै
लुट,नतरि आँखिरी बखत पछतालै जब पद जाल् छुटि।
खैर शहराक आठ रामलीलनक् चंद दिणाक बाद एक रामलील कमेटीक अध्यक्ष पेटूराम धैं मैंन कौ- यौ बार म्यर च्यल पप्पू कैं लै रामलील में क्वे पाठ खेलण दिणेकि किरपा करौ। वील झटपट चंदकि रकम दुगुणी करि दी और द्वी हजार रूपैंकि पर्ची काटि दी। मैंन संतोष करौ कि नानतिनन् कैं भाल् संस्कार दिणाक लिजी यतुक त करणै पड़ल। पेटूराम बुलाणी- पप्पू कैं रामैकि सेना में भरती करण छ या रावणैकि? मैंन कौ कि रामैकि सेना ठिक रौलि। मैं भौ कैं भल संस्कारी बणून चाँ। पेटूराम फिर बुलाणी- रामैकि बानरों वालि सेना भलि छ, खर्च पात लै जादा नि लागन। बस एक लाल रङक चमकणी कच्छ पैरण पड़ों हैगै। देखुंन अगर क्वे डंड बचौल त मुगदराक रूप में उकैं लै थमैं दियूंन। विज्ञानाक मुताबिक बानरोंकि पुछड़ि अलोपै हैगै, यैक वील पुछड़िक लै खर्च बचि जाँ। बस जै श्री राम,जै श्री राम बुलाण छ।
बात चली रैछि कि इतुकै में पप्पू द्वारन धैं ऐगै,सब बात चीत सुणिबेर वील जिद पकड़ि हालि कि उ रावणैकि सेना में भरती ह्वल। पप्पू ल कौ कि मैं कैं रावण काकनैकि चार काव कोट वाल् लुकुड़ पैरण छन्। अगर मैं खाल्ली लाल कच्छ पैरुंन त म्यार मौहल्ल वालि दगड़ू (गलफ्रैंड) स्वीटी मैं परि हँसलि। पप्पू ल खुट दन दन्यून शुरु करि दी। मैंन समजा-च्यलौ एक्कै लुकुड़न में के न धरि राख, ल्याकत, चाल-चलन (चरित्र) असल हुँछ। तूकैं रामक जस बणन् छ, तबै लोग तेरि इजत कराल्। पप्पू बौई (बिदक) ग्ये और कूँण लाग् कि तुम चाँछा भगवान रामैकि चार तुमार कूँण पर मैं जङल न्हैं जाँ और नानू (छोटू) कैं तुम म्यर वीडियो गेम, खेल खिलौण,साइकिल,कम्र सबै चीज दी दियो। मैंन पप्पू कैं फिर समजा- देख च्यलौ यस न बुलान,नानू त्यर भै भ्ये। दुणी समाज के कौल? अखबार में खबर आलि कि "भैन में भै लड़ैं"। पप्पू क्यैलै सुणन हूँ राजि न्हैंती- अखबारौक के छ? जब रावणक भिसूँण (पुतला) नान् आकारक हुँछ तौ कूँनी महंगाई में घटि ग्यो रावणक 'कद', जब आकार ठुल करी जाँ त कूँनी समाज में बुराईयोंक दगाड़-दगाड़ै रावणक लै 'कद' बढिगो। अखबार वालन कैं बस तिलक ताड़ और राईक पहाड़ बणून ऊं। पप्पू आपणि जिद में अड़ि रौछी। उथकै,पेटूराम दुहरी जाग् चंद मांगण अर् पैली आपस मेंई ठैरियूँणेकि बात कै बेर वाँ बटी न्हैं ग्या।
खैर शहराक आठ रामलीलनक् चंद दिणाक बाद एक रामलील कमेटीक अध्यक्ष पेटूराम धैं मैंन कौ- यौ बार म्यर च्यल पप्पू कैं लै रामलील में क्वे पाठ खेलण दिणेकि किरपा करौ। वील झटपट चंदकि रकम दुगुणी करि दी और द्वी हजार रूपैंकि पर्ची काटि दी। मैंन संतोष करौ कि नानतिनन् कैं भाल् संस्कार दिणाक लिजी यतुक त करणै पड़ल। पेटूराम बुलाणी- पप्पू कैं रामैकि सेना में भरती करण छ या रावणैकि? मैंन कौ कि रामैकि सेना ठिक रौलि। मैं भौ कैं भल संस्कारी बणून चाँ। पेटूराम फिर बुलाणी- रामैकि बानरों वालि सेना भलि छ, खर्च पात लै जादा नि लागन। बस एक लाल रङक चमकणी कच्छ पैरण पड़ों हैगै। देखुंन अगर क्वे डंड बचौल त मुगदराक रूप में उकैं लै थमैं दियूंन। विज्ञानाक मुताबिक बानरोंकि पुछड़ि अलोपै हैगै, यैक वील पुछड़िक लै खर्च बचि जाँ। बस जै श्री राम,जै श्री राम बुलाण छ।
बात चली रैछि कि इतुकै में पप्पू द्वारन धैं ऐगै,सब बात चीत सुणिबेर वील जिद पकड़ि हालि कि उ रावणैकि सेना में भरती ह्वल। पप्पू ल कौ कि मैं कैं रावण काकनैकि चार काव कोट वाल् लुकुड़ पैरण छन्। अगर मैं खाल्ली लाल कच्छ पैरुंन त म्यार मौहल्ल वालि दगड़ू (गलफ्रैंड) स्वीटी मैं परि हँसलि। पप्पू ल खुट दन दन्यून शुरु करि दी। मैंन समजा-च्यलौ एक्कै लुकुड़न में के न धरि राख, ल्याकत, चाल-चलन (चरित्र) असल हुँछ। तूकैं रामक जस बणन् छ, तबै लोग तेरि इजत कराल्। पप्पू बौई (बिदक) ग्ये और कूँण लाग् कि तुम चाँछा भगवान रामैकि चार तुमार कूँण पर मैं जङल न्हैं जाँ और नानू (छोटू) कैं तुम म्यर वीडियो गेम, खेल खिलौण,साइकिल,कम्र सबै चीज दी दियो। मैंन पप्पू कैं फिर समजा- देख च्यलौ यस न बुलान,नानू त्यर भै भ्ये। दुणी समाज के कौल? अखबार में खबर आलि कि "भैन में भै लड़ैं"। पप्पू क्यैलै सुणन हूँ राजि न्हैंती- अखबारौक के छ? जब रावणक भिसूँण (पुतला) नान् आकारक हुँछ तौ कूँनी महंगाई में घटि ग्यो रावणक 'कद', जब आकार ठुल करी जाँ त कूँनी समाज में बुराईयोंक दगाड़-दगाड़ै रावणक लै 'कद' बढिगो। अखबार वालन कैं बस तिलक ताड़ और राईक पहाड़ बणून ऊं। पप्पू आपणि जिद में अड़ि रौछी। उथकै,पेटूराम दुहरी जाग् चंद मांगण अर् पैली आपस मेंई ठैरियूँणेकि बात कै बेर वाँ बटी न्हैं ग्या।
-मूल रचना- गाौरव त्रिपाठी
~राजेंद्र ढैला,काठगोदाम।
रविवार, 29 जनवरी 2017
बुधवार, 18 जनवरी 2017
पप्पू तो रावण की सेना में जाएगा
पप्पू तो रावण की सेना में जाएगा
रामलीला का सीजन आते ही चंदा शुरू, धंधा शुरू और कटना बंदा शुरू। हमारे शहर में पहले एक रामलीला होती थी, आजकल हर मोहल्ले में होती है। सबकी अलग-अलग रामलीला कमेटी। हर कमेटी का अलग चुनाव। चुनाव के लिए हर साल महाभारत। सुना है कि इस बार रामलीला कमेटी के पूर्व अध्यक्ष ने वर्तमान अध्यक्ष पर चंदे में घोटाले का आरोप लगाकर खूब बवाल किया। वर्तमान अध्यक्ष ने भी पूर्व अध्यक्ष पर अपने समय में घोटाले को पहले देखने की नसीहत दे डाली। दोनों ने एक दूसरे को सरेआम सड़क पर चप्पलों से पीटा। उनसे कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। अंतकाल पछताएगा, जब पद जाएगा छूट।
खैर शहर की आठ रामलीलाओं को चंदा देने के बाद एक रामलीला कमेटी के अध्यक्ष पेटूराम से मैंने कहा-इस बार मेरे बेटे पप्पू को भी रामलीला में कोई पात्र अदा करने देने की कृपा करें। उसने फौरन चंदे की रकम दुगुनी कर दी और दो हजार रूपये की पर्ची काट दी। मैंने संतोष किया-बच्चों में अच्छे संस्कार डालने के लिए इतना तो करना ही पड़ेगा। पेटूराम बोले-पप्पू को राम की सेना में भर्ती करना है या रावण की। मैंने कहा कि राम की सेना ठीक रहेगी मैं बच्चे को संस्कारी बनाना चाहता हूं। पेटूराम फिर बोले-राम की बंदरों वाली सेना अच्छी है। खर्चा भी ज्यादा नहीं होता है। सिर्फ एक लाल रंग का चमकीला कच्छा पहनाना पड़ता है। देखेंगे अगर कोई डंडा बचेगा तो गदा के रूप में उसे भी थमा देंगे। साइंस के अनुसार बंदरों की पूंछ लुप्त हो चुकी है, इसलिए पूंछ का खर्चा बच जाता है। बस जय श्रीराम, जय श्रीराम बोलना है।
बात चल रही थी कि इतने में पप्पू दरवाजे पर आ गया। सबकुछ सुनकर उसने जिद पकड़ ली कि वो रावण की सेना में भर्ती होगा। पप्पू ने कहा कि मुझे रावण अंकल की तरह काले कोट वाली ड्रेस पहननी है। खाली लाल कच्छा पहनूंगा तो मेरे मोहल्ले वाली गर्लफ्रेंड स्वीटी मुझ पर हंसेगी। पप्पू ने पैर पटकना शुरू किया। मैंने समझाया-बेटा केवल ड्रेस में कुछ नहीं रखा है। चरित्र मुख्य है। तुम्हें राम की तरह बनना है, तभी लोग तुम्हारी इज्जत करेंगे। पप्पू बिदक चुका था-आप तो चाहते हैं कि भगवान राम की तरह आपके कहने पर जंगल चला जाउं और छोटू को आप मेरा वीडियो गेम, खिलौने, साइकिल, कमरा सब सौंप दें। मैंने पप्पू को फिर समझाया-देखो बेटा ऐसा नहीं बोलते, छोटू तुम्हारा भाई है। समाज क्या कहेगा, अखबार में खबर आएगी कि ‘भाई में हुई लड़ाई‘। पप्पू को कुछ सुनना मंजूर नहीं था-अखबार का क्या है। जब रावण के पुतले का साइज छोटा होता है तो कहते हैं महंगाई में घटा रावण का कद। जब साइज बड़ा किया जाता है तो कहते हैं समाज में बुराइयों के साथ रावण का कद बढ़ा। अखबारों वालों को बस तिल का ताड़ बनाना आता है। पप्पू अपनी जिद पर अड़ा था। उधर, पेटूराम दूसरी जगह चंदा मांगने और पहले आपस में तय करने की बात कहकर वहां से चले गए।
-गौरव त्रिपाठी, युवा व्यंग्यकार, हल्द्वानी, उत्तराखंड
9411913230
रामलीला का सीजन आते ही चंदा शुरू, धंधा शुरू और कटना बंदा शुरू। हमारे शहर में पहले एक रामलीला होती थी, आजकल हर मोहल्ले में होती है। सबकी अलग-अलग रामलीला कमेटी। हर कमेटी का अलग चुनाव। चुनाव के लिए हर साल महाभारत। सुना है कि इस बार रामलीला कमेटी के पूर्व अध्यक्ष ने वर्तमान अध्यक्ष पर चंदे में घोटाले का आरोप लगाकर खूब बवाल किया। वर्तमान अध्यक्ष ने भी पूर्व अध्यक्ष पर अपने समय में घोटाले को पहले देखने की नसीहत दे डाली। दोनों ने एक दूसरे को सरेआम सड़क पर चप्पलों से पीटा। उनसे कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। अंतकाल पछताएगा, जब पद जाएगा छूट।
खैर शहर की आठ रामलीलाओं को चंदा देने के बाद एक रामलीला कमेटी के अध्यक्ष पेटूराम से मैंने कहा-इस बार मेरे बेटे पप्पू को भी रामलीला में कोई पात्र अदा करने देने की कृपा करें। उसने फौरन चंदे की रकम दुगुनी कर दी और दो हजार रूपये की पर्ची काट दी। मैंने संतोष किया-बच्चों में अच्छे संस्कार डालने के लिए इतना तो करना ही पड़ेगा। पेटूराम बोले-पप्पू को राम की सेना में भर्ती करना है या रावण की। मैंने कहा कि राम की सेना ठीक रहेगी मैं बच्चे को संस्कारी बनाना चाहता हूं। पेटूराम फिर बोले-राम की बंदरों वाली सेना अच्छी है। खर्चा भी ज्यादा नहीं होता है। सिर्फ एक लाल रंग का चमकीला कच्छा पहनाना पड़ता है। देखेंगे अगर कोई डंडा बचेगा तो गदा के रूप में उसे भी थमा देंगे। साइंस के अनुसार बंदरों की पूंछ लुप्त हो चुकी है, इसलिए पूंछ का खर्चा बच जाता है। बस जय श्रीराम, जय श्रीराम बोलना है।
बात चल रही थी कि इतने में पप्पू दरवाजे पर आ गया। सबकुछ सुनकर उसने जिद पकड़ ली कि वो रावण की सेना में भर्ती होगा। पप्पू ने कहा कि मुझे रावण अंकल की तरह काले कोट वाली ड्रेस पहननी है। खाली लाल कच्छा पहनूंगा तो मेरे मोहल्ले वाली गर्लफ्रेंड स्वीटी मुझ पर हंसेगी। पप्पू ने पैर पटकना शुरू किया। मैंने समझाया-बेटा केवल ड्रेस में कुछ नहीं रखा है। चरित्र मुख्य है। तुम्हें राम की तरह बनना है, तभी लोग तुम्हारी इज्जत करेंगे। पप्पू बिदक चुका था-आप तो चाहते हैं कि भगवान राम की तरह आपके कहने पर जंगल चला जाउं और छोटू को आप मेरा वीडियो गेम, खिलौने, साइकिल, कमरा सब सौंप दें। मैंने पप्पू को फिर समझाया-देखो बेटा ऐसा नहीं बोलते, छोटू तुम्हारा भाई है। समाज क्या कहेगा, अखबार में खबर आएगी कि ‘भाई में हुई लड़ाई‘। पप्पू को कुछ सुनना मंजूर नहीं था-अखबार का क्या है। जब रावण के पुतले का साइज छोटा होता है तो कहते हैं महंगाई में घटा रावण का कद। जब साइज बड़ा किया जाता है तो कहते हैं समाज में बुराइयों के साथ रावण का कद बढ़ा। अखबारों वालों को बस तिल का ताड़ बनाना आता है। पप्पू अपनी जिद पर अड़ा था। उधर, पेटूराम दूसरी जगह चंदा मांगने और पहले आपस में तय करने की बात कहकर वहां से चले गए।
-गौरव त्रिपाठी, युवा व्यंग्यकार, हल्द्वानी, उत्तराखंड
9411913230
~टिकटाक लिजी चिट्ठी~
मूल रचना-गाौरव त्रिपाठी~टिकटाक लिजी चिट्ठी~चुनावनकि धमक पङते ही राजनैतिक पाल्टीयोंक् सर्वेसर्वा-मुखियान (हाईकमान) धैं टिकट ल्हिणाक् लिजी नेताओंकि होङ मची रै। चुनाव ब्यवस्थापकोंक (प्रभारियों) पास अच्याल टिकट मांगणी वाल् दावेदारोंकि चिट्ठीनक खात् लागि रौ। सबै उननकैं मतकौंण में धन बलल् लागी छन्। इनन में की एक चिट्ठी मैंकें प्रापत भै, जो यौ प्रकारल छ--
माननीय नेता ज्यू
जै भारत
सुणन में ऊना कि म्यार इलाक बटी चुनाव लङन हूँ, भौतै लोगोंल् तुमार सामणि दावेदारी ठोक राखै, छाङो उनन् कें। तुम त जाणनेरै भया, कि हमर और तुमर रिश्त भौत पुराण छ। आज लै विधानसभा छेत्र में तुम गुंडागर्दीक जो डर देखना हा, वु म्यारै वील छ। उमर चाहे जतुक लै हैगै होलि पैं इलाक में दादागिरी पुरि उसी छ जसि पैली छी। तुमार बाज्यू और मैंन दगाङ-दगाङै पैली अन्याय फिर राजनैतिक दुणी में खुट धरौ। न मालम कतुक खून,बलात्कार,अपहरण,चोरि-चकारी करी। हमेशा थाणन् में शिकैत (रिपोर्ट) लेखी बेर रयी,कभै पुलिस घर तलक न आ सकी। आब त यौ नई-नई नानतिन आगई, जो छ्वाट-म्वाट टूजी-स्पेक्ट्रम,कौमनवेल्थ और काव् धन जास घोटाल लै भलि ढंगल न करि सकनैं। फसि जनई और पाल्टीक नाम बन्नाम करनई। हमार जमान् में त सरकारी डबल कभत खिसिक् बेर जेबन पुजिगो पत्तै न चलनेर भै। मैंकें याद छ भोपाल गैस कांड। कब कांड भौ कभत वारेन एंडरसन देश छोङिबेर सरकारी शानौशौकताक् दगाङ न्हैंगै,लोग आज तलक समजि न सक बलकन गजबजाटै में छन। चलौ खैर छोङो यौ सब बात पुराणी हैगी। सुणन में ऊनौ कि आपूं फिलमी कलाकारन कैं टिकट दिण में भौत चाव देखूनौछा। अगर येसि वालि बात छ त यौ हिसाबल लै मैं टिकटाक लिजी बिलकुल फिट छूँ।
आल्लै-आल्लै हमार इलाक में जो महाभारतकि लीला शुरू भै,यमें मैंन धृतराष्टक रोल निभा। उसिक धृतराष्टक रोल हमार राजनैतिक जीवन में रोजै रूनेर भै। जनता बचौ या मरौ हम त आँख बंद करि बेर बैठ रूनेर भयां। हमार कौरब रूपी गुंड शहर में लङै करून,लोगन् में फूट डलूण,जातिवाद फैलूण, आदीन में अघिल रूनेर भाय। हम सूनसान कौरब और पांडबनक जुवाक खेल में मनमर्जी अर् अत्याचारों कैं देखनै रूनू। जनता रूपी द्रौपदीक चीरहरण हुनै रूँ और हम आनंद ल्हिनै रूनू। द्रौपदी त पैलियै पांचाली भै,उकैं थ्वाङ लोगोंन आजी नँगङ करि हालौ त यमें म्यर के दोष ! यैक अलावा रामलील में रावणक पाठ मैंकें छोङि क्वे न खेलि सकन्। जो लै चीज म्यार मन ऐजैं,वु चाहे माता सीता हो या गरीब-गुरीबनकि छानि-छुपरी,झोपड़ीन कें तुङवैबेर आप्वीं हथियै ल्हीयूँ। हर बारै कि चार यौ बार लै लोगन कैं रुवाट,कपङ,मकानैकि हौसि दिखै राखै। संतै मुसई और हिंदू भोट मेरि जेब में छन। यैकै वील मैं आंश करूँ कि हर बारैकि चार यौ बार लै तुम मैंकणी टिकट देला।
......चुलबुल पाण्डे
......हुण-हुण दबंग।
अनुवादक-राजेंद्र ढैला
सोमवार, 19 दिसंबर 2016
~फ्यासबुक में ग्यानैकि ढूँनखोज~
~फ्यासबुक में ग्यानैकि ढूँनखोज~
फ्यासबुक आज मनखी जीवनक् खास अंग छ। नानतिन आपण इस्कूली
किताब पढौ चाहे न पढौ, पैं ब्याव तलक पाँच छै बेरा फ्यासबुकाक् अपडेट क्वे
लै हालतन् में पढी ल्हिनी। च्याल् यकैं चेलियांन् कैं पटूँण हुणि भौतै
मधतगार माननी। अगर क्वे चेलिल मितरामी अनुरोध मंजूर {फ्रैण्ड रिक्वेस्ट
एक्सेप्ट} करि हाली त समझो आदुक आंदोलन पुर हैगो। फ्यासबुकल लोगनाक भितेर
लुकी कारीगरी लै भ्यार निकाई है। यैकै वील कतू लोग फोटूग्राफर त कतू लोग
लेखक,साहित्यकार बणि गई। जैकि लै दिवाल {फेसबुक वॉल} में देखछा कविता,शायरी
और दरशन देखण हूँ मिलना। लाईक और कमिंट पाणाक् लिजी लोग के नि करनै?
अस्पताव में खून दिण बखत,शहरैकि साप-सफाई करण बखत, फोटुक खैंचूंनई।
जबरदस्ती पैंस फुकिबेर घूमण {हॉलीडे} हूँ जानई। आफी आपणि मजाग बणूनी वालि
फोटुक लै पोस्ट करनई। फ्यासबुक आब राजनीति में लै भौतै खास भूमिका निभूंण
लागि रौ। यमें पार्टियों क गठन तलक है जानई। यैल मुख्यमंत्री बणीं जै सकनौ।
अरविंद केजरीवाल ज्यू यैक एक भाल् उदाहरण छन्। उनन् कैंईं देखिबेर और दल
लै फ्यासबुक में आपण दांव अजमूण लाग रई। पैं उनार पचाङ वी पुराण छन्। जैक
वील उ धार्मिक भावना भङकै बेर कतू झगङ-फसाद {दंग} करूँण में कामयाब हई और
हाव् कैं उनून आपणि तरबै हूँ मोङौ। यैकै लिजी यैक एक नाम फसाद बुक लै धरि
दी गो। मल्लब 'करौ क्वे भरौ क्वे'। पैली यौ केवल अमीरोंकै अमीरीक निशाण छी।
आब सब मुबाईलन् में इंटरनेटैकि क्रांतील यकैं भौतै गरीब-गुरीबन् तलक लै
पुजा हालौ। इनन् में रिक्शवाल् ,झाङ् प्वछ वाल् नौकर-नौकरानी,भिकारि सबै
शामिल छन्। लोगन् कैं देखि-देखिबेर, यौ लै आपण मनाक भावन कैं कविताओंल
सामणी धरण फै गई।
याँ कुछेक लोग-बागनैकि दिवाल में करी पोस्टोंकि जानकारी दिण ठिक रौलि...
सबन् हैं पैली रिक्शवालाक् दिवाल में लेखी शायरी--
* रत्तै-रत्तै द्वी पैग लगैबेर रिक्श चलूण में बङ माज् ऊँ,
पैं जब बैठें पछिल मोटि-मोटि सवारी, सारै दम जानै रूँ।
याँ कुछेक लोग-बागनैकि दिवाल में करी पोस्टोंकि जानकारी दिण ठिक रौलि...
सबन् हैं पैली रिक्शवालाक् दिवाल में लेखी शायरी--
* रत्तै-रत्तै द्वी पैग लगैबेर रिक्श चलूण में बङ माज् ऊँ,
पैं जब बैठें पछिल मोटि-मोटि सवारी, सारै दम जानै रूँ।
एक नौकराणिक खात् में लेखी छी...
* आजकल हमरि मीम सैब पार्टियों में बिजी छ।
तबै त सैप कैं शुकून, म्यर काम ईजी छ।।
यै मेंई आई यक कमिंट..
हमूंन त रोज करण भै चूल्हा चौक।
पैं सैप कैं पटूंणक्,यौ छ भल मौक।।
* आजकल हमरि मीम सैब पार्टियों में बिजी छ।
तबै त सैप कैं शुकून, म्यर काम ईजी छ।।
यै मेंई आई यक कमिंट..
हमूंन त रोज करण भै चूल्हा चौक।
पैं सैप कैं पटूंणक्,यौ छ भल मौक।।
भारताक् भिकारि रोजै बदलावकारी रई छन्। उनरी एक पोस्ट....
* चौराई में बैठी-बैठी,कमर टेढि हैगै।
पैं द्वी रूपैं दिण में,यौ अमीरोंकि आम् मरिगै।
{खबरदार-यत्ती मकोटै आमक् जिगर छ हाँ}
यैई में आई एक हुश्यार तितिर किस्मक भिकारिक कमिंट..
* यौ अमीरोंक् खिलाप,एक आंदोलन छेङन छ।
दस रूपैं हैबेर कम,आब कैलै न ल्हिन छ।।
मलियाक उदाहरणोंल हम समजि सकनु कि यौ फ्यासबुक या फसकबुक दूहारों कैं जलूंणी,आपण उल्लू सिद करणी और आपणी भङांस निकालनी बुक छ।
-मूल रचना- गाौरव त्रिपाठी, हल्द्वानी* चौराई में बैठी-बैठी,कमर टेढि हैगै।
पैं द्वी रूपैं दिण में,यौ अमीरोंकि आम् मरिगै।
{खबरदार-यत्ती मकोटै आमक् जिगर छ हाँ}
यैई में आई एक हुश्यार तितिर किस्मक भिकारिक कमिंट..
* यौ अमीरोंक् खिलाप,एक आंदोलन छेङन छ।
दस रूपैं हैबेर कम,आब कैलै न ल्हिन छ।।
मलियाक उदाहरणोंल हम समजि सकनु कि यौ फ्यासबुक या फसकबुक दूहारों कैं जलूंणी,आपण उल्लू सिद करणी और आपणी भङांस निकालनी बुक छ।
~अनुवादक-राजेंद्र ढैला,काठगोदाम।
मंगलवार, 29 नवंबर 2016
-गीताक संशोधित उपदेश-
-गीताक संशोधित उपदेश-
भक्तोंक् बार-बार तिख् सवालोंल दुखी पोंगा पंडितोंल यो बार भागवत गीता कें ई बदलणक फैसाल् करि ल्हे। यैक लिजी पोंगा पंडितोंकि ठुल्ली सभा बुलाई गै। तय तारीकाक् दिन देशाक् सबै पोंगा पंडित-जोगी बाबा आदि पुजी।
सभाकि अध्यक्षता करनेर निराशाराम बापूल सबन् हैं पैली बुलाण शुरू करौ-संत जनौ ! बखत कैकै नि हुन। बदलावै जीवन छ,यै लिजी बखताक् अनुसार सब चीज बदलते रूण चैंनी। यौ भौत दुखाक् दगाङ कूँण पङना कि सन् १९५० में बणीं संविधान में लै जाँ कतू बार सुधार {संशोधन} हैगो। वाईं लोगों कें धर्मक् पाठ पढूनी वालि भागवत गीता में एक बारलै सुधार न हैरै। भगवान श्रीकृष्णल अर्जुन कें जो उपदेश दी उ महाभारतैकि लङै करण हैं पैलीयाक छी। पांडवन् कें लङैंक् बाद के करण चैंछ? यौ भगवान श्रीकृष्णल बताए न्हाँ,यैकै वील पांडवन् कें मोक्ष पाणक् सई बाट् न मिल। आब कलियुग में भगतोंकि तकलीफ बढि ग्यै। दिन पर दिन भगत उल्ट-सुल्ट सवाल करनई, जनर जवाब गीता में घंटों ढुणन् पर लै न मिलन्। अदालतों में लै खाली गीता में हात धरैबेर कसम खवै ल्ही जैं। यौ न देखी जान् कि गीताक उपदेश कतुक् पुराण है गई। यमें सुधाराक् लिजी हुकुम दी जाओ,यै हैं भल हमन् यौ काम हुंणी आब खुदै अघिल ऊण होल्। गीता में सुधाराक लिजी सबनाक् बिचार आमंत्रित छन्,यतुक कै बेर निराशाराम ज्यू बैठ गई।
आब् पोंगा पंडित महासभाक अध्यक्ष अनियमित्तानंद स्वामी ठाङ भई-हे साधू ! गीता में श्री कृष्णल कै राखौ करम करौ फलकि ईछ्या न करौ। यौ बात ऐलाक परिवेश में ठिक् न बैठनि। करम हम करूँ और फल दुहर खाओ,यौ उपदेश जकें सुणैं दियो उ साधु-बाबाओंक पास दुहरीबारा लौटीबेर न ऊँन। अच्यालन् उसिक लै लोग बिना काम करियै फलकि ईछ्या धरनीं। सबै जाणी लॉटरीक नंबर पुछण हूँ ऊनई। बस एक्कै बार लागि जाओ त पुर जिंदगी भरीक् अरामै-अराम। यै लिजी यौ उपदेश कें तुरंतै हटूँण होल्।
यैक बाद दुहार संत बाबा कामदेवल हात जोङिबेर आपण बिचार धरण शुरू करी-संतजनौ वेदपुराणों कें पढिबेर,हम लोगन् थैं साँचि बुलाण हूँ कूँनू। पैं यस आब संभव न्हाँ। कलियुग में झुटि बुलाण आम आदिमकि मजबूरी न बल्कि जरवत लै छ। औपिस में अगर आदिम झुटि न बुलाओ कि वीकि स्यैणी बीमार हैरै, त उकें छुट्टी कसिक मिललि? अदालत में वकील झुटि गभाई या सबूत पेश न करलौ, त उ मुकर्दम कसिक जीतल? डॉक्टर अगर मामूली बुखार कें टायफैट बतैबेर मरीज धैं पैंस न ऐंठौल त वीकि दुकानदारी कसिक चलैलि? नेता अगर जनता थैं झुट वैद न करलौ त उ चुनाव कसिक जीतल? क्वे च्यल् अगर क्वे चेली हुणी झुटि न बुलालौ त उ आपणि चार्-चार् दगङू चेलियान् {गर्लफ्रेंडन्} कें कसिक संभालल्? यै लिजी यौ कथन कें बंद करण, मनखीक भलाई में छ।
यौ बार सबन् हैं ठुल बाबा श्री श्री २०१० हवाई जहाजल् प्रवचन शुरु करौ-भगत जनौ .......। चारों तरबटी महात्माओं कें देखिबेर,बाबा तुरंत गलती सुदारते हुए दुहरीबेरा बुलाणी-छिमा करिया श्रीमन् ! दिनभरी एकसा प्रवचन दिनै-दिनै आदत जसि बणिगै। खैर हम लोग भारतवासियों कें आपस में भाई-बैणी बतूंनै रै गयां और महाराष्ट्र में राजठाकरे मराठी मनख्योंक् राज बतैबेर सारी प्रसिद्धि ल्हिनगो। हमन् थैं प्रवचन सुणन हुँ बस बुणियै स्यैणी ऊँनी। उथकै एकता कपूरल् घर में क्लेश और जाल साजीक नाटक दिखै-दिखैबेर सबै ज्वान स्यैणियों कें आपणि तरफ खैंचि हालौ। हम लोगन् कें आपण भितेर सुख-शान्ति ढुण नकै संदेश दिनै रयाँ। आब कदम उठूणै पङल, भौत हैगै भाई-बंदीकि बात। आत्म संतुष्टीकि पुंतुरि, सहनशीलताकि सीमा।
सभा खतम हुणाक् बाद गीता में सुधार करण हूँ इग्यार पोंगा पंडितोंकि एक टीमक गठन करी गो। टीमल् पाँच सालोंकि खूब मिहनताक् बाद "गीताक उपदेशों में सुधार" नामक नई ग्रंथ बजार में उतारौ,ग्रंथाक कुछेक महत्वपूर्ण अंश याँ दी जानई....
० काम करिबेर क्वे राज् न बणिरै,यै लिजी फलकि ईछ्या सबकुछ छ। फल पाणाक् लिजी अगर कै कें घूस दिण / ल्हिण या घोटाल करण पङौ त चुकण न चैंन।
० झुटि बुलाण क्वे पाप न्हाँ बल्कि काम आसान करणैकि एक तरकीब छ। अगर सतयुक में राजा हरीशचंद्र झुटि बुलै दिना त जिंदगी भरि राजपाठक् सुख भोगन् और मरण हबेर पैली एकबेरा गंगा नै {स्नान} करि ऊँना त सब पाप लै ध्वेई जान्।
० पङोसीक सुख देखिबेर जलण सिखो और उकें खड्डन् धक्यूंनैकि खूब कोशिश करो। जिंदगी में अगर तुम सुखी न्हाँता त तुमर पङोसी कें सुखी रूणक क्वे हक न्हाँ।
० दुहारोंकि भलाई करण आम मनखीक काम न्हाँ,यै लिजी भलाईक काम भगवानाक् ऊपर छोडि दिण चैं। मनखी कें क्वे लै काम में आपणै लोभ देखण चैं।
० क्वे लै मनखीक दगङ तबै तक दिण चैं जब तलक उ बटी काम निकवना,काम निकवनाक् बाद झट्ट आपण रंग बुदई ल्हिण चैं।
० जसिक पुराणि गीता में भगवान कृष्णल् कै राखौ दुश्मण सिर्फ दुश्मण हूँ,चाहे उ आपण सांकै किलै न्हाँ। आब् नई गीता में दुश्मणोंकि केर और जादा बढै हालै। आब अगर जमीन जायदात कें ल्हीबेर मैं-बाप या स्यैणी लै बाट् में जिटक् बणिबेर किलै न आओ,उनन् केंलै बाट् बटी हटूंण में न चुकण चैंन।
जागैकि कमी हुणाक् कारण सबै उपदेश न लिखी जै सकनै,यै लिजी पुरि जानकारी ल्हिण तैं संशोधित गीताक उपदेश बजार बटी खरिदिबेर पढिया।
.....धन्यवाद...
---------------------------
मूल रचना- गाौरव त्रिपाठी, हल्द्वानी
अनुवादक- राजेंद्र ढैला,काठगोदाम।
भक्तोंक् बार-बार तिख् सवालोंल दुखी पोंगा पंडितोंल यो बार भागवत गीता कें ई बदलणक फैसाल् करि ल्हे। यैक लिजी पोंगा पंडितोंकि ठुल्ली सभा बुलाई गै। तय तारीकाक् दिन देशाक् सबै पोंगा पंडित-जोगी बाबा आदि पुजी।
सभाकि अध्यक्षता करनेर निराशाराम बापूल सबन् हैं पैली बुलाण शुरू करौ-संत जनौ ! बखत कैकै नि हुन। बदलावै जीवन छ,यै लिजी बखताक् अनुसार सब चीज बदलते रूण चैंनी। यौ भौत दुखाक् दगाङ कूँण पङना कि सन् १९५० में बणीं संविधान में लै जाँ कतू बार सुधार {संशोधन} हैगो। वाईं लोगों कें धर्मक् पाठ पढूनी वालि भागवत गीता में एक बारलै सुधार न हैरै। भगवान श्रीकृष्णल अर्जुन कें जो उपदेश दी उ महाभारतैकि लङै करण हैं पैलीयाक छी। पांडवन् कें लङैंक् बाद के करण चैंछ? यौ भगवान श्रीकृष्णल बताए न्हाँ,यैकै वील पांडवन् कें मोक्ष पाणक् सई बाट् न मिल। आब कलियुग में भगतोंकि तकलीफ बढि ग्यै। दिन पर दिन भगत उल्ट-सुल्ट सवाल करनई, जनर जवाब गीता में घंटों ढुणन् पर लै न मिलन्। अदालतों में लै खाली गीता में हात धरैबेर कसम खवै ल्ही जैं। यौ न देखी जान् कि गीताक उपदेश कतुक् पुराण है गई। यमें सुधाराक् लिजी हुकुम दी जाओ,यै हैं भल हमन् यौ काम हुंणी आब खुदै अघिल ऊण होल्। गीता में सुधाराक लिजी सबनाक् बिचार आमंत्रित छन्,यतुक कै बेर निराशाराम ज्यू बैठ गई।
आब् पोंगा पंडित महासभाक अध्यक्ष अनियमित्तानंद स्वामी ठाङ भई-हे साधू ! गीता में श्री कृष्णल कै राखौ करम करौ फलकि ईछ्या न करौ। यौ बात ऐलाक परिवेश में ठिक् न बैठनि। करम हम करूँ और फल दुहर खाओ,यौ उपदेश जकें सुणैं दियो उ साधु-बाबाओंक पास दुहरीबारा लौटीबेर न ऊँन। अच्यालन् उसिक लै लोग बिना काम करियै फलकि ईछ्या धरनीं। सबै जाणी लॉटरीक नंबर पुछण हूँ ऊनई। बस एक्कै बार लागि जाओ त पुर जिंदगी भरीक् अरामै-अराम। यै लिजी यौ उपदेश कें तुरंतै हटूँण होल्।
यैक बाद दुहार संत बाबा कामदेवल हात जोङिबेर आपण बिचार धरण शुरू करी-संतजनौ वेदपुराणों कें पढिबेर,हम लोगन् थैं साँचि बुलाण हूँ कूँनू। पैं यस आब संभव न्हाँ। कलियुग में झुटि बुलाण आम आदिमकि मजबूरी न बल्कि जरवत लै छ। औपिस में अगर आदिम झुटि न बुलाओ कि वीकि स्यैणी बीमार हैरै, त उकें छुट्टी कसिक मिललि? अदालत में वकील झुटि गभाई या सबूत पेश न करलौ, त उ मुकर्दम कसिक जीतल? डॉक्टर अगर मामूली बुखार कें टायफैट बतैबेर मरीज धैं पैंस न ऐंठौल त वीकि दुकानदारी कसिक चलैलि? नेता अगर जनता थैं झुट वैद न करलौ त उ चुनाव कसिक जीतल? क्वे च्यल् अगर क्वे चेली हुणी झुटि न बुलालौ त उ आपणि चार्-चार् दगङू चेलियान् {गर्लफ्रेंडन्} कें कसिक संभालल्? यै लिजी यौ कथन कें बंद करण, मनखीक भलाई में छ।
यौ बार सबन् हैं ठुल बाबा श्री श्री २०१० हवाई जहाजल् प्रवचन शुरु करौ-भगत जनौ .......। चारों तरबटी महात्माओं कें देखिबेर,बाबा तुरंत गलती सुदारते हुए दुहरीबेरा बुलाणी-छिमा करिया श्रीमन् ! दिनभरी एकसा प्रवचन दिनै-दिनै आदत जसि बणिगै। खैर हम लोग भारतवासियों कें आपस में भाई-बैणी बतूंनै रै गयां और महाराष्ट्र में राजठाकरे मराठी मनख्योंक् राज बतैबेर सारी प्रसिद्धि ल्हिनगो। हमन् थैं प्रवचन सुणन हुँ बस बुणियै स्यैणी ऊँनी। उथकै एकता कपूरल् घर में क्लेश और जाल साजीक नाटक दिखै-दिखैबेर सबै ज्वान स्यैणियों कें आपणि तरफ खैंचि हालौ। हम लोगन् कें आपण भितेर सुख-शान्ति ढुण नकै संदेश दिनै रयाँ। आब कदम उठूणै पङल, भौत हैगै भाई-बंदीकि बात। आत्म संतुष्टीकि पुंतुरि, सहनशीलताकि सीमा।
सभा खतम हुणाक् बाद गीता में सुधार करण हूँ इग्यार पोंगा पंडितोंकि एक टीमक गठन करी गो। टीमल् पाँच सालोंकि खूब मिहनताक् बाद "गीताक उपदेशों में सुधार" नामक नई ग्रंथ बजार में उतारौ,ग्रंथाक कुछेक महत्वपूर्ण अंश याँ दी जानई....
० काम करिबेर क्वे राज् न बणिरै,यै लिजी फलकि ईछ्या सबकुछ छ। फल पाणाक् लिजी अगर कै कें घूस दिण / ल्हिण या घोटाल करण पङौ त चुकण न चैंन।
० झुटि बुलाण क्वे पाप न्हाँ बल्कि काम आसान करणैकि एक तरकीब छ। अगर सतयुक में राजा हरीशचंद्र झुटि बुलै दिना त जिंदगी भरि राजपाठक् सुख भोगन् और मरण हबेर पैली एकबेरा गंगा नै {स्नान} करि ऊँना त सब पाप लै ध्वेई जान्।
० पङोसीक सुख देखिबेर जलण सिखो और उकें खड्डन् धक्यूंनैकि खूब कोशिश करो। जिंदगी में अगर तुम सुखी न्हाँता त तुमर पङोसी कें सुखी रूणक क्वे हक न्हाँ।
० दुहारोंकि भलाई करण आम मनखीक काम न्हाँ,यै लिजी भलाईक काम भगवानाक् ऊपर छोडि दिण चैं। मनखी कें क्वे लै काम में आपणै लोभ देखण चैं।
० क्वे लै मनखीक दगङ तबै तक दिण चैं जब तलक उ बटी काम निकवना,काम निकवनाक् बाद झट्ट आपण रंग बुदई ल्हिण चैं।
० जसिक पुराणि गीता में भगवान कृष्णल् कै राखौ दुश्मण सिर्फ दुश्मण हूँ,चाहे उ आपण सांकै किलै न्हाँ। आब् नई गीता में दुश्मणोंकि केर और जादा बढै हालै। आब अगर जमीन जायदात कें ल्हीबेर मैं-बाप या स्यैणी लै बाट् में जिटक् बणिबेर किलै न आओ,उनन् केंलै बाट् बटी हटूंण में न चुकण चैंन।
जागैकि कमी हुणाक् कारण सबै उपदेश न लिखी जै सकनै,यै लिजी पुरि जानकारी ल्हिण तैं संशोधित गीताक उपदेश बजार बटी खरिदिबेर पढिया।
.....धन्यवाद...
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मूल रचना- गाौरव त्रिपाठी, हल्द्वानी
अनुवादक- राजेंद्र ढैला,काठगोदाम।
शनिवार, 19 नवंबर 2016
गुरुवार, 17 नवंबर 2016
बुधवार, 9 नवंबर 2016
फेसबुक पर शोध
व्यंग्य-गौरव त्रिपाठी, हल्द्वानी, उत्तराखंड, 9411913230
फेसबुक आज मानव जीवन का अभिन्न अंग है। बच्चे अपने कोर्स की बुक पढ़ें या न पढ़ें लेकिन शाम तक पांच-छह बार फेसबुक पर अपडेट हर हाल में पढ़ लेते हैं। लड़के इसे लड़कियां पटाने में काफी मददगार मानते हैं। अगर किसी लड़की ने फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली तो समझो आधी मुहिम पूरी हो गई। फेसबुक ने लोगों की सृजनात्मक क्षमता भी बढ़ाई है। इसके कारण कई फोटोग्राफर तो कई लोग साहित्यकार बन गए। जिसकी वॉल पर देखो कविताएं, शायरी और दर्शन नजर आता है। लाइक और कमेंट्स पाने के लिए लोग क्या नहीं करते। रक्तदान, नगर की सफाई करते हुए फोटो खिंचाते हैं, जबरन पैसा खर्च करके हॉलीडे मनाने जाते हैं। खुद का मजाक उड़ाने वाले चित्र पोस्ट करते हैं। फेसबुक अब राजनीति में भी मुख्य भूमिका निभा रहा है। इस पर पार्टियों के गठन तक हो जाते हैं। इससे सीएम भी बना जा सकता है। अरविंद केजरीवाल इसका उदाहरण हैं। उनको देख अन्य दल भी फेसबुक पर अपने दांव आजमाने लगे हैं। लेकिन उनके फंडे वही पुराने हैं। जिससे वे धार्मिक भावनाएं भड़काकर कई दंगे कराने में कामयाब हुए और हवा अपनी ओर मोड़ी। इससे इसका नाम फसाद बुक तक रख दिया गया। यानी करे कोई भरे कोई। पहले ये सिर्फ अमीरों को स्ट्ेटस सिंबल था। अब हर मोबाइल पर इंटरनेट क्रांति ने इसे अत्यंत गरीब तबके तक भी पहुंचा दिया है। इसमें रिक्शेवाले, नौकरानियां, भिखारी आदि तक शामिल हैं। लोगों को देख-देखकर ये भी अपने मन की भावनाओं को कविताओं के माध्यम से व्यक्त करते हैं। यहां कुछ लोगों के वॉल पर किए गए पोस्ट की जानकारी देना उचित होगा। सबसे पहले रिक्शेवाले के वॉल पर लिखी शायरी-सुबह-सुबह दो पैग लगाकर रिक्शा चलाने में बड़ा मजा आता है।
लेकिन पीछे जब बैठती हैं मोटी-मोटी सवारियां तो दम निकल जाता है।
एक नौकरानी के अकाउंट पर लिखा था-
आजकल मेम साहब किटी पार्टियों में बिजी हैं,
इसलिए साहब को सुकून और मेरा काम ईजी है।
इस पर आया एक कमेंट -
हमें तो रोज करना चूल्हा चौका है।
पर साहब को पटाने का ये अच्छा मौका है।
भारत के भिखारी हमेशा से क्रांतिकारी रहे हैं। उनका एक पोस्ट-
चौराहे पर बैठे-बैठे टेढ़ी कमर हो जाती है।
पर दो रूपये देने में इन अमीरों की नानी मर जाती है।
इस पर आया एक प्रबुद्ध भिखारी का कमेंट-
इन अमीरों के खिलाफ एक आंदोलन छेड़ना है।
दस रूपये से कम अब किसी को नहीं लेना है।
उपरोक्त उदाहरणों से हम समझ सकते हैं कि फेसबुक दूसरों को जलाने, अपना उल्लू सीधा करने और भड़ास निकालने की बुक है।
शुक्रवार, 20 जुलाई 2012
अपनी बात
लंबे इंतजार के बाद मेरा दूसरा व्यंग्य संग्रह ‘प्रेत की तलाश‘ आपके समक्ष है। वर्ष 2010 में जब मेरा पहला व्यंग्य संग्रह ‘पैकेज का पपलू‘ आया था तो उम्मीद से बेहतर लोगों नेे उसे सराहा। जिससे संबल पाकर और लिखने की ललक जगी। इसलिए अपने हर पाठक को मैं धन्यवाद देना चाहता हूं।
किताब के लिए मैं आभार जताना चाहूंगा वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री हरीश नवल जी, श्री प्रेम जनमेजय जी, श्री सुभाष चंदर जी, श्री लालित्य ललित जी, श्री गिरीश पंकज जी और श्री विनोद शंकर शुक्ल जी का। जो हमेशा से ही पथ प्रदर्शक की तरह मेरे लिए ज्ञान की ज्योति जलाते रहे। मेरे लेखक बनने के पीछे सबसे ज्यादा योगदान कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय और कार्टून वॉच पत्रिका का रहा। जिन्होंने प्रोत्साहित कर सदैव आगे बढ़ते रहने को कहा। कार्टून वॉच के संपादक श्री त्रयंबक शर्मा जी हर बार अपनी पत्रिका में स्थान देते रहे और लिखने की इच्छा को हवा देते रहे। इस तरह पत्रकारिता विश्वविद्यालय में कुलपति श्री सच्चिदानंद जोशी जी और विभागाध्यक्ष श्री शाहिद अली जी मेरी साहित्यक गतिविधि को बढ़ावा देते रहे। मेरे पहले व्यंग्य संग्रह ‘पैकेज का पपलू‘ के विमोचन समारोह को उन्हीं ने यादगार बनाया। आशा है कि पिछली बार की तरह यह अंक भी आपको पसंद आएगा।
- गौरव त्रिपाठी
बुधवार, 18 जुलाई 2012
गौरव त्रिपाठी
जीवन परिचय
गौरव त्रिपाठी ने काफी कम समय में कई उपलब्धियां हासिल की हैं। नवंबर 2005 से व्यंग्य लेखन की शुरूआत करने के बाद अब तक कई समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में उनके लेख छप चुके हैं। अक्टूबर 2006 में उन्हें कार्टून वाच पत्रिका के वार्षिक समारोह में सम्मानित किया गया। 2012 में उन्हें भगवती देवी स्मृति युवा व्यंग्यश्री का हल्द्वानी में सम्मान दिया गया। उन्होंने एमजेपी रूहेलखंड विश्वविद्यालय बरेली, उत्तर प्रदेश से डिप्लोमा इन मास कम्यूनिकेशन की परीक्षा में 74 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। इसके बाद उन्होंने कुषाभाउ ठाकरे जनसंचार एवं पत्रकारिता विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़ से मास्टर आफ जनर्लिज्म (एमजे) की डिग्री प्रथम श्रेणी में प्राप्त की। पत्रकारिता की शिक्षा के दौरान उन्होंने नवभारत, रायपुर समाचार पत्र में इंटर्नशिप की। उन्हें इलेक्ट्रानिक मीडिया का भी अनुभव प्राप्त है। उन्होंने अपने कैरियर की शुरूआत नई दुनिया, रायपुर समाचार पत्र से की। इस समय वे हिंदी दैनिक अमर उजाला, हल्द्वानी, उत्तराखंड में उपसंपादक के पद पर कार्यरत हैं। ‘पैकेज का पपलू’ उनकी पहली पुस्तक है। वे हांगकांग और मकाउ की यात्रा भी कर चुके हैं।संपर्क-बीबीजई चौराहा, नई कालोनी, आनंदपुरम शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश)
फोन-9411913230, 9808106676
मंगलवार, 6 सितंबर 2011
भूतनी के लिए प्रेत की तलाश
-व्यंग्य,
जैसे-जैसे भूतनी बड़ी हो रही थी वैसे-वैसे उसके चांडाल बाप और डायन मां को चिंता सताने लगी। भूतनी का आए रात रोता हुआ चेहरा चांडाल बाप देख नहीं पा रहा था। पहले उसका चेहरा कितना डरावना लगता था लोग उसे देखते ही सांस लेना भूल जाते थे। वह पहले कितना लोगों का खून चूसा करती थी। अब तो उसका किसी को डराने का मन ही नहीं करता। उसके लंबे-लंबे बाल, बड़े-बड़े दांत, नुकीले नाखून, भयानक आंखे, गठिला बदन किसी साजन (प्रेत) की तलाश में सूखते जा रहे हैं। अपनी बेटी को परेशान देख आखिरकार चांडाल बाप ने उसके लिए एक प्रेत पति ढूंढ़ने का फैसला कर लिया। मृत्यूलोक और भूतलोक का पूरा चक्कर लगाने के बाद दामाद की तलाश में चांडाल बाप अंत में अपने मित्र के पास पहुंचा। लटके हुए मुंह के साथ पहुंचे चांडाल को देख मित्र ने उससे परेशानी का कारण पूछा। इस पर चांडाल ने कबीरदास के अंदाज में आते हुए उत्तर दिया-दामाद जो ढूंढ़न मैं गया प्रेत न मिलया कोई। मित्र के इतनी टेक्नीकल बात न समझ पाने पर चांडाल ने स्पष्ट व्यथा सुनाना शुरू किया-अब क्या बताऊं मेरी बेटी भूतनी दिन-ब-दिन यौवन के दिनों में अंगड़ाई ले रही है। लेकिन अब भूतों में कोई अच्छा वर मिलता ही नहीं है। पहले धरती पर आए दिन पापियों का नाश होता रहता था। इस कारण पृथ्वीलोक से कभी हिरणाकश्यप, कभी रावण, तो कभी महिषासुर आते ही रहते थे। क्या शान थी उस जमाने में भूतलोक की। हमेशा रौनक रहती थी। कोई प्रेत अपनी डरावनी आवाज सुना रहा है तो कोई पिशाच अपने भयानक शरीर से चीखने को मजबूर कर रहा है। लेकिन अब तो धरती से कोई बीस दिन से भूखा मरकर आ रहा है तो कोई सीधा-सादा व्यक्ति अपनी ईमानदारी के कारण। कोई डाक्टर की लापरवाही से मरता है। अधिकतर लोग टेªन दुघर्टना, बस हादसे, प्लेन क्रैस या फिर दंगों में मरकर पहुंचते हैं। ये लोग वहां तो रोते ही रहते हैं, यहां भूत बनकर भी चैन नहीं लेते। लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है? मित्र ने जानने की कोशिश की। चांडाल बाप ने बात को विस्तार दिया-ये सब धरती पर रहने वाले सत्ताधारी नेताओं की वजह से हो रहा है। ये नेता खुद तो मरते नहीं साथ में किसी पापी को भी मरने नहीं देते। कोर्ट हत्यारों को फांसी की सजा सुनाती है और ये अपने वोट बैंक के चक्कर में दया याचना मांगने लगते हैं। संसद में हमले के आरोपी अफजल गुरू और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारोपी पेरारीवालन, मुरूगन और संतन सजा मिलने के बाद भी सरकारी दामाद बने हुए हैं। इस पर मित्र ने चांडाल बाप की चिंता दूर करते हुए कहा कि फिक्र मत करो सुना है कि धरती अब अन्ना हजारे नाम के एक शख्स ने जन्म लिया है। जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर रहा है। उसके आंदोलन को समर्थन भी खूब मिल रहा है। नेता भी अपनी दुकान लुटने के डर से घबराए हुए हैं। चांडाल ने फिर झुंझलाते हुए कहा-नेताओं का कोई भरोसा नहीं है। उन्होंने अन्ना हजारे को ही फंसाना शुरू कर दिया है। अफसोस जाहिर करते हुए मित्र ने भारत के प्रेतों को छोड़ विदेश में वैम्पायर तलाश करने की सलाह दी। इस पर चांडाल खुशी से उझल पड़ा और दामाद की तलाश में विदेशी धरती के लिए रवाना हो गया।
जैसे-जैसे भूतनी बड़ी हो रही थी वैसे-वैसे उसके चांडाल बाप और डायन मां को चिंता सताने लगी। भूतनी का आए रात रोता हुआ चेहरा चांडाल बाप देख नहीं पा रहा था। पहले उसका चेहरा कितना डरावना लगता था लोग उसे देखते ही सांस लेना भूल जाते थे। वह पहले कितना लोगों का खून चूसा करती थी। अब तो उसका किसी को डराने का मन ही नहीं करता। उसके लंबे-लंबे बाल, बड़े-बड़े दांत, नुकीले नाखून, भयानक आंखे, गठिला बदन किसी साजन (प्रेत) की तलाश में सूखते जा रहे हैं। अपनी बेटी को परेशान देख आखिरकार चांडाल बाप ने उसके लिए एक प्रेत पति ढूंढ़ने का फैसला कर लिया। मृत्यूलोक और भूतलोक का पूरा चक्कर लगाने के बाद दामाद की तलाश में चांडाल बाप अंत में अपने मित्र के पास पहुंचा। लटके हुए मुंह के साथ पहुंचे चांडाल को देख मित्र ने उससे परेशानी का कारण पूछा। इस पर चांडाल ने कबीरदास के अंदाज में आते हुए उत्तर दिया-दामाद जो ढूंढ़न मैं गया प्रेत न मिलया कोई। मित्र के इतनी टेक्नीकल बात न समझ पाने पर चांडाल ने स्पष्ट व्यथा सुनाना शुरू किया-अब क्या बताऊं मेरी बेटी भूतनी दिन-ब-दिन यौवन के दिनों में अंगड़ाई ले रही है। लेकिन अब भूतों में कोई अच्छा वर मिलता ही नहीं है। पहले धरती पर आए दिन पापियों का नाश होता रहता था। इस कारण पृथ्वीलोक से कभी हिरणाकश्यप, कभी रावण, तो कभी महिषासुर आते ही रहते थे। क्या शान थी उस जमाने में भूतलोक की। हमेशा रौनक रहती थी। कोई प्रेत अपनी डरावनी आवाज सुना रहा है तो कोई पिशाच अपने भयानक शरीर से चीखने को मजबूर कर रहा है। लेकिन अब तो धरती से कोई बीस दिन से भूखा मरकर आ रहा है तो कोई सीधा-सादा व्यक्ति अपनी ईमानदारी के कारण। कोई डाक्टर की लापरवाही से मरता है। अधिकतर लोग टेªन दुघर्टना, बस हादसे, प्लेन क्रैस या फिर दंगों में मरकर पहुंचते हैं। ये लोग वहां तो रोते ही रहते हैं, यहां भूत बनकर भी चैन नहीं लेते। लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है? मित्र ने जानने की कोशिश की। चांडाल बाप ने बात को विस्तार दिया-ये सब धरती पर रहने वाले सत्ताधारी नेताओं की वजह से हो रहा है। ये नेता खुद तो मरते नहीं साथ में किसी पापी को भी मरने नहीं देते। कोर्ट हत्यारों को फांसी की सजा सुनाती है और ये अपने वोट बैंक के चक्कर में दया याचना मांगने लगते हैं। संसद में हमले के आरोपी अफजल गुरू और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारोपी पेरारीवालन, मुरूगन और संतन सजा मिलने के बाद भी सरकारी दामाद बने हुए हैं। इस पर मित्र ने चांडाल बाप की चिंता दूर करते हुए कहा कि फिक्र मत करो सुना है कि धरती अब अन्ना हजारे नाम के एक शख्स ने जन्म लिया है। जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर रहा है। उसके आंदोलन को समर्थन भी खूब मिल रहा है। नेता भी अपनी दुकान लुटने के डर से घबराए हुए हैं। चांडाल ने फिर झुंझलाते हुए कहा-नेताओं का कोई भरोसा नहीं है। उन्होंने अन्ना हजारे को ही फंसाना शुरू कर दिया है। अफसोस जाहिर करते हुए मित्र ने भारत के प्रेतों को छोड़ विदेश में वैम्पायर तलाश करने की सलाह दी। इस पर चांडाल खुशी से उझल पड़ा और दामाद की तलाश में विदेशी धरती के लिए रवाना हो गया।
रविवार, 4 सितंबर 2011
हमारे प्यारे गुरूजी
पता नहीं क्यों मैं निबंध में फेल हो जाता हूं। हर बार इतना अच्छा लिखता हूं फिर भी...। इस बार हाईस्कूल में ‘हमारे प्यारे गुरूजी’ पर निबंध लिखने के लिए आया था। अब आप देखिए और बताइये—
ईश्वर की एक ऐसी संरचना जिसे देखकर प्राय: बच्चे डर जाते हैं, गुरूजी कहते हैं। गुरूजी के दो पैर, एक नाक, एक मुंह और दो आंखें होती हैं। इनको मास्टर, मास्साब, अध्यापक, प्रोफेसर या सर कहकर पुकारते हैं। इनकी उत्पत्ति रामायण काल से भी पहले की मानी जाती है। उस समय ये जंगलों आदि में नदी किनारे के आश्रमों में पाये जाते थे। तब ये एक साधारण धोती धारण करते थे। छात्र इनके पास आश्रम में रहकर ही शिक्षा ग्रहण करते थे, लेकिन फीस का भुगतान नहीं करते थे। इससे गुरूजी खासे नाराज रहते थे और उनकी रैगिंग स्वयं ही लेते थे। पुरानी खबर है कि आरूणी नाम के एक शिष्य को उसके गुरू ने आधी रात को तेज बारिश में अपने खेत की मेढ़ बनाने भेज दिया। पानी का बहाव बहुत तेज था इसलिए मेढ़ नहीं बन पा रही थी, मगर गुरूजी के डर से वह खुद मेढ़ बनकर वहीं लेट गया। एकलव्य को तो अपने अंगूठे से ही हाथ धोना पड़ गया। भगवान राम और कृष्ण भी इस रैगिंग से अछूते नहीं रह पाए। उस काल में प्रसिद्ध पत्रकार नारद जी को इंटरव्यू के दौरान भगवान राम ने बताया कि हम तो गुरू वशिष्ट की रैगिंग से परेशान हैं। आधी-—आधी रात तक पैर दबवाते रहते हैं।
लेकिन आजकल गुरूओं का ट्रेंड बदल गया है। अब गुरू आधुनिकता की मशीन से बाहर निकलकर आ रहे हैं और गा रहे हैं—धोती कुर्ता छोड़ा, मैंने सूट—बूट डाला...। मुंह में पान मसाला चबाना, सिगरेट पीना इनकी प्रमुख पहचान है। केवल शिक्षा देना ही नहीं बल्कि परीक्षा में पास कराना भी इनकी जिमेदारी होती है। इसके लिए इनके पास अलग से फीस देकर प्राइवेट ट्यूशन पढऩी अनिवार्य होती है। कालेज में ज्यादातर इनका समय दूसरे शिक्षकों के साथ गप्पे मारने, राजनीति पर चर्चा करने, विदेशी संस्कृति की बुराई करने, फिल्मों में दिखाई जा रही अश£ीलता, क्रिकेट मैच में सचिन और धोनी की परफारमेंस पर वाद—विवाद करने में व्यतीत होता है। क्लास में पीरियड लेना ये अपनी शान के खिलाफ समझते हैं।
स्कूल या कालेज में छात्राओं के साथ छेड़छाड़ करना, उन्हें एसएमएस करना, जर्मप्लाज्म की चोरी करना इनकी प्रमुख गतिविधियों में शामिल है। छात्रों को सुधारने के लिए हाथ—पैर तोडऩे के उनके पास विशेषाधिकार प्राप्त हैं। फिल्मों में अभी इन्हें बड़े रोल नहीं मिल पा रहे हैं। फिल्म में ये केवल क्लास में हीरो—हीरोइनों का आपस में परिचय कराने और लेडी टीचरों के साथ इश्क लड़ाने का कार्य करते हैं। दर्शकों को हंसाने में इनका प्रमुख योगदान रहता है। शिक्षकों की ऐसी महानताओं को ध्यान में रखते हुए हम शिक्षक दिवस मनाते हैं। हमें अपने गुरूओं पर गर्व है।
ईश्वर की एक ऐसी संरचना जिसे देखकर प्राय: बच्चे डर जाते हैं, गुरूजी कहते हैं। गुरूजी के दो पैर, एक नाक, एक मुंह और दो आंखें होती हैं। इनको मास्टर, मास्साब, अध्यापक, प्रोफेसर या सर कहकर पुकारते हैं। इनकी उत्पत्ति रामायण काल से भी पहले की मानी जाती है। उस समय ये जंगलों आदि में नदी किनारे के आश्रमों में पाये जाते थे। तब ये एक साधारण धोती धारण करते थे। छात्र इनके पास आश्रम में रहकर ही शिक्षा ग्रहण करते थे, लेकिन फीस का भुगतान नहीं करते थे। इससे गुरूजी खासे नाराज रहते थे और उनकी रैगिंग स्वयं ही लेते थे। पुरानी खबर है कि आरूणी नाम के एक शिष्य को उसके गुरू ने आधी रात को तेज बारिश में अपने खेत की मेढ़ बनाने भेज दिया। पानी का बहाव बहुत तेज था इसलिए मेढ़ नहीं बन पा रही थी, मगर गुरूजी के डर से वह खुद मेढ़ बनकर वहीं लेट गया। एकलव्य को तो अपने अंगूठे से ही हाथ धोना पड़ गया। भगवान राम और कृष्ण भी इस रैगिंग से अछूते नहीं रह पाए। उस काल में प्रसिद्ध पत्रकार नारद जी को इंटरव्यू के दौरान भगवान राम ने बताया कि हम तो गुरू वशिष्ट की रैगिंग से परेशान हैं। आधी-—आधी रात तक पैर दबवाते रहते हैं।
लेकिन आजकल गुरूओं का ट्रेंड बदल गया है। अब गुरू आधुनिकता की मशीन से बाहर निकलकर आ रहे हैं और गा रहे हैं—धोती कुर्ता छोड़ा, मैंने सूट—बूट डाला...। मुंह में पान मसाला चबाना, सिगरेट पीना इनकी प्रमुख पहचान है। केवल शिक्षा देना ही नहीं बल्कि परीक्षा में पास कराना भी इनकी जिमेदारी होती है। इसके लिए इनके पास अलग से फीस देकर प्राइवेट ट्यूशन पढऩी अनिवार्य होती है। कालेज में ज्यादातर इनका समय दूसरे शिक्षकों के साथ गप्पे मारने, राजनीति पर चर्चा करने, विदेशी संस्कृति की बुराई करने, फिल्मों में दिखाई जा रही अश£ीलता, क्रिकेट मैच में सचिन और धोनी की परफारमेंस पर वाद—विवाद करने में व्यतीत होता है। क्लास में पीरियड लेना ये अपनी शान के खिलाफ समझते हैं।
स्कूल या कालेज में छात्राओं के साथ छेड़छाड़ करना, उन्हें एसएमएस करना, जर्मप्लाज्म की चोरी करना इनकी प्रमुख गतिविधियों में शामिल है। छात्रों को सुधारने के लिए हाथ—पैर तोडऩे के उनके पास विशेषाधिकार प्राप्त हैं। फिल्मों में अभी इन्हें बड़े रोल नहीं मिल पा रहे हैं। फिल्म में ये केवल क्लास में हीरो—हीरोइनों का आपस में परिचय कराने और लेडी टीचरों के साथ इश्क लड़ाने का कार्य करते हैं। दर्शकों को हंसाने में इनका प्रमुख योगदान रहता है। शिक्षकों की ऐसी महानताओं को ध्यान में रखते हुए हम शिक्षक दिवस मनाते हैं। हमें अपने गुरूओं पर गर्व है।
मंगलवार, 2 अगस्त 2011
टिकट के लिए पत्र
-व्यंग्य
चुनाव की दस्तक होते ही राजनीतिक पार्टियों के हाईकमान में टिकट पाने के लिए नेताओं में होड़ मची हुई है। चुनाव प्रभारियों के पास इन दिनों टिकट मांगने वाले दावेदारों के पत्रों का ढेर लगा हुआ है। सभी उन्हें रिझाने में धन-बल से लगे हुए हैं। इनमें से एक पत्र पर मुझे प्राप्त हुआ है। जो कुछ इस प्रकार है-माननीय नेताजीजय भारत! सुना है कि मेरे क्षेत्र से चुनाव के लिए कई लोगों ने आपके सामने दावेदारी पेश की है, छोड़िए उनको। आप तो जानते ही हैं कि हमारा और आपका संबंध बहुत पुराना है। आज भी विधानसभा क्षे़त्र में आप गुंडों की जो दहशत देखते हैं वो मेरी वजह से ही है। उम्र चाहे जितनी भी हो गई हो, लेकिन क्षेत्र में दबंगई पूरी बरकरार है। आपके पिताजी और मैने साथ साथ ही पहले अपराध और फिर राजनीति की दुनिया में कदम रखा। न जाने कितने खून, रेप, अपहरण, डकैतियां कीं। हमेशा थानों में बस रिपोर्ट दर्ज होकर रह गई। कभी पुलिस घर पर नहीं आ पाई। अब तो ये नए-नए बच्चे आ गए हैं, जो छोटे-मोटे टूजी स्पैक्ट्रम, कॉमनवेल्थ और काले धन जैसे घोटाले भी ठीक ढंग से नहीं कर पाते हैं। फंस जाते हैं और पार्टी का नाम खराब करते हैं। हमारे जमाने में तो सरकारी पैसा कब सरक कर जेब में पहुंच जाता था, पता ही नहीं चलता था। मुझे याद है भोपाल गैस कांड। कब कांड हुआ और कब वारेन एंडरसन देश छोड़कर सरकारी शानौशौकत के साथ चला गया, लोग आज तक असमंजस में हैं। चलिए खैर छोड़िए ये सब पुरानी बातें हैं। सुना है कि आप फिल्मी सितारों को टिकट देने में काफी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। अगर ऐसा है तो इस लिहाज से भी मै टिकट के लिए उपयुक्त हूं। अभी-अभी क्षेत्र में महाभारत की लीला शुरू हुई है। इसमें मैंने धृतराष्टþ का रोल निभाया है। वैसे धृतराष्ट्र की भूमिका मेरे राजनीतिक जीवन में हमेशा रहती है। जनता जिए या मरे हम तो आंख बंद किए हुए बैठे रहते हैं। हमारे कौरव रूपी गंुडे शहर में दंगा कराने, लोगों में फूट डलवाने, जातिवाद फैलाने आदि में आगे रहते हैं। हम चुपचाप कौरव और पांडवों के जुंए के खेल में मनमानी और ज्यादतियों को देखते रहते हैं। जनता रूपी द्रौपदी का चीरहरण होता रहता है और हम आनंद लेते रहते हैं। द्रौपदी तो पहले से ही पांचाली थी, कुछ लोगों ने और उसे निर्वस्त्र कर दिया तो इसमें मेरा क्या दोष! इसके अलावा रामलीला में रावण का रोल तो मेरे सिवा कोई कर नहीं पाता। जो भी चीज मुझे पसंद आती है, चाहे वो माता सीता हो या गरीबों की झोपड़ियां। उन्हें तुड़वाकर उन पर कब्जा कर लेता हूं। हर बार की तरह इस बार भी लोगों को रोटी, कपड़ा, मकान की गुगली दे रखी है। सारे मुसलिम और हिंदू वोट मेरी जेब में हैं। इसलिए उम्मीद करता हूं कि हर बार की तरह इस बार भी आप मुझे ही टिकट देंगे। चुलबुल पांडे हुड़-हुड़ दबंग।
चुनाव की दस्तक होते ही राजनीतिक पार्टियों के हाईकमान में टिकट पाने के लिए नेताओं में होड़ मची हुई है। चुनाव प्रभारियों के पास इन दिनों टिकट मांगने वाले दावेदारों के पत्रों का ढेर लगा हुआ है। सभी उन्हें रिझाने में धन-बल से लगे हुए हैं। इनमें से एक पत्र पर मुझे प्राप्त हुआ है। जो कुछ इस प्रकार है-माननीय नेताजीजय भारत! सुना है कि मेरे क्षेत्र से चुनाव के लिए कई लोगों ने आपके सामने दावेदारी पेश की है, छोड़िए उनको। आप तो जानते ही हैं कि हमारा और आपका संबंध बहुत पुराना है। आज भी विधानसभा क्षे़त्र में आप गुंडों की जो दहशत देखते हैं वो मेरी वजह से ही है। उम्र चाहे जितनी भी हो गई हो, लेकिन क्षेत्र में दबंगई पूरी बरकरार है। आपके पिताजी और मैने साथ साथ ही पहले अपराध और फिर राजनीति की दुनिया में कदम रखा। न जाने कितने खून, रेप, अपहरण, डकैतियां कीं। हमेशा थानों में बस रिपोर्ट दर्ज होकर रह गई। कभी पुलिस घर पर नहीं आ पाई। अब तो ये नए-नए बच्चे आ गए हैं, जो छोटे-मोटे टूजी स्पैक्ट्रम, कॉमनवेल्थ और काले धन जैसे घोटाले भी ठीक ढंग से नहीं कर पाते हैं। फंस जाते हैं और पार्टी का नाम खराब करते हैं। हमारे जमाने में तो सरकारी पैसा कब सरक कर जेब में पहुंच जाता था, पता ही नहीं चलता था। मुझे याद है भोपाल गैस कांड। कब कांड हुआ और कब वारेन एंडरसन देश छोड़कर सरकारी शानौशौकत के साथ चला गया, लोग आज तक असमंजस में हैं। चलिए खैर छोड़िए ये सब पुरानी बातें हैं। सुना है कि आप फिल्मी सितारों को टिकट देने में काफी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। अगर ऐसा है तो इस लिहाज से भी मै टिकट के लिए उपयुक्त हूं। अभी-अभी क्षेत्र में महाभारत की लीला शुरू हुई है। इसमें मैंने धृतराष्टþ का रोल निभाया है। वैसे धृतराष्ट्र की भूमिका मेरे राजनीतिक जीवन में हमेशा रहती है। जनता जिए या मरे हम तो आंख बंद किए हुए बैठे रहते हैं। हमारे कौरव रूपी गंुडे शहर में दंगा कराने, लोगों में फूट डलवाने, जातिवाद फैलाने आदि में आगे रहते हैं। हम चुपचाप कौरव और पांडवों के जुंए के खेल में मनमानी और ज्यादतियों को देखते रहते हैं। जनता रूपी द्रौपदी का चीरहरण होता रहता है और हम आनंद लेते रहते हैं। द्रौपदी तो पहले से ही पांचाली थी, कुछ लोगों ने और उसे निर्वस्त्र कर दिया तो इसमें मेरा क्या दोष! इसके अलावा रामलीला में रावण का रोल तो मेरे सिवा कोई कर नहीं पाता। जो भी चीज मुझे पसंद आती है, चाहे वो माता सीता हो या गरीबों की झोपड़ियां। उन्हें तुड़वाकर उन पर कब्जा कर लेता हूं। हर बार की तरह इस बार भी लोगों को रोटी, कपड़ा, मकान की गुगली दे रखी है। सारे मुसलिम और हिंदू वोट मेरी जेब में हैं। इसलिए उम्मीद करता हूं कि हर बार की तरह इस बार भी आप मुझे ही टिकट देंगे। चुलबुल पांडे हुड़-हुड़ दबंग।
रविवार, 24 अप्रैल 2011
हातिमताई का पुनर्जन्म
हातिमताई का पुनर्जन्म हो गया है। ये अधिकतर हाफिज भाई कहते हैं। वे अपने को हातिमताई का दूसरा अवतार मानते हैं। इसलिए उन्होंने अपना नाम भी हातिमताई ही रख लिया है। वे हमेशा दूसरों की मदद को तत्पर रहते हैं। अगर कोई उन्हें अपनी परेशानी नहीं बताता है तो उसकी नाक में दम कर वे दुविधा उगलवा ही लेते हैं। हातिमताई को लोगों की समस्याएं सुलझाने का बड़ा शौक है। अधिकतर उनके घर में गरीब मजदूर डेरा डालकर पड़े रहते हैं, उनकी मोटरसाइकिल मोहल्ले के सभी लोग चलाते दिख जाते है। हातिमताई की आधे से ज्यादा सैलरी उधार पर ही रहती है। मुसीबत के वक्त मोहल्ले वाले हमेशा उनको आगे कर देते हैं। उनकी दरियादिली से मोहल्ले में उनकी एक विशेष पहचान बन गई है। लेकिन उनको तलाश थी अपने पिछले जन्म में सात सवाल पूछने वाली हुस्नबानो की। काफी खोजबीन के बाद एक दिन वह उनको मिल ही गई। इस जन्म में उनका नाम जनता था। तंग हाल जनता कभी गरीबी, कभी महंगाई, कभी सांप्रदायिक दंगों तो कभी घोटालों से सताई हुई है। इतना सबकुछ सहने के बाद अब सिवाय कुंठा झेलने के अलावा उसके पास कोई रास्ता नहीं है। ऊपर से अपनी आदत से मजबूर हातिमताई “मुझे बताया- मुझे बताया“ कहकर उसकी परेशानी और बढ़ाने लगे। अंत में तंग होकर उसने अपने सात सवालों का उत्तर लाने को कह ही दिया। हातिमताई जैसे इसी पल के इंतजार में ही थे। जनता ने अपने सवाल बताने शुरू किए-1. ऐसी कौन सी चीज है, जिस पर हमारे देश के नेता राजनीति नहीं करते।2. क्या अन्ना हजारे की ओर से भ्रष्टाचार के विरोध में चलाई गई मुहिम कामयाब हो पाएगी।3. क्या कभी इस देश कोे स्वच्छ राजनीति या स्वच्छ नेता मिल पाएगा।4. आखिर कब तक जनता इस आस में हर रात भूखी सोती रहेगी कि कल उसे भरपेट खाना मिलेगा।5. कब लोग देर रात को छोड़ो दिन में ही बेखौफ घूम सकेंगे। 6. कब तक नेता गरीब के घर में रोटी खाकर, उन्हें झूठे सपने दिखाकर लूटते रहेंगे।7. अपनी आवाज उठाने वाली जनता कब तक पुलिस की लाठियों से पिटती रहेगी।हातिमताई सातों सवालों को कागज में नोटकर जवाबों के लिए दिल्ली रवाना हो गए। एक हते तक उनकी कोई खबर नहीं आई। ठीक आठवें दिन हातिमताई हांफते हुए हुस्नबानो (जनता) के पास पहुंचे। उनके कपड़े फटे और बाल बिखरे हुए थे। शायद कई दिनों से उन्होंने खाना भी नहीं खाया था। हुस्नबानो ने उनकी हालत पर ज्यादा ध्यान न देते हुए उत्साह वश तुरंत अपने सवालों के जवाब पूछ लिए। बेहाल हातिमताई ने अपना यात्रा वृतांत सुनाते हुए जवाब देना शुरू किया-तुम्हारे पहले सवाल का उत्तर जैसे ही मैंने दिल्ली के एक नेता से पूछा तो वह भड़क गया। उसने मुझ पर विरोधी पार्टी का गुर्गा, देशद्रोही, माओवादी, आतंकवादी और न जाने क्या-क्या आरोप लगाकर पुलिस को सौंप दिया। सात दिनों तक पुलिस वालों ने मेरी जमकर ठुकाई की। बड़ी मुश्किल से आठवें दिन पुलिस को रिश्वत देकर जैसे-तैसे छूटकर आया हूं। ये नेता कभी भी किसी पर राजनीति कर सकते हैं। हातिमताई बनने का भूत मेरे ऊपर से उतर चुका है। मैं हाफिज खान ही ठीक हूं। इतना कहकर हातिमताई अपने घर वापस लौट गए और जनता के बाकी सवाल अनसुलझे ही रह गए।
रविवार, 2 जनवरी 2011
मुंगेरीलाल का सपना
मुंगेरीलाल ने इस बार नए साल में फिर हसीन सपना देखा। देखा कि महंगाई कम हो गई है। प्याज पांच रूपये किलो मिल रहा है, पेट्रोल भी दस रूपये सस्ता हो गया है। हर युवा के पास अब रोजगार है। अब जाति और क्षेत्र के नाम पर राजनीति नहीं होती, गरीब अब ठंड से नहीं मरता उसके ऊपर अपनी पक्की छत है। भारत अब फिर से सोने की चिड़िया कहा जाने लगा है। सपना टूटते ही मुंगेरीलाल मेरे पास दौड़े-दौड़े चले आए और हमेशा की तरह लंबी-चौड़ी हांकने लगे।बोले- बुजुर्गों ने कहा है कि दिन का देखा सपना हमेशा सच होता है। देखना इस बार मेरा सपना जरूर पूरा होगा। इस पर मैंने उन्हें समझाते हुए कहा- माना कि सुबह के समय देखे गए सपने अकसर पूरे होते हैं, लेकिन भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी जी का प्रधानमंत्री बनने का सपना अभी तक पूरा नहीं हुआ। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की लालटेन जलने का नाम ही नहीं ले रही। बसपा सुप्रीमो मायावती का अपने पुतले लगवाने का सपना बार-बार कोर्ट तोड़ रही है। सलमान खान का ऐश्वर्या राय से शादी करने का सपना हमेशा के लिए सपना ही बन गया। आमिर खान भी अब तक सपने में ही ऑस्कर देख रहे हैं। अभिषेक बच्चन ने तो अब हिट फिल्म के सपने देखना ही छोड़ दिया है। कभी दर्शक तरस खाकर फिल्म हिट करा दे ंतो वो अलग बात है। मुंगेरीलाल गुस्साए-तुम ये राजनीति और फिल्मों की बातें छोड़ो। वहां तो ऐसा चलता ही रहता है। आम आदमी के बारे में सोचो। रतन टाटा ने देखो नैनो बनाकर आम आदमी के कार पर बैठने का सपना पूरा कर दिया। अब हर आम आदमी कार खरीदने को उत्सुक है। मैने फिर मुंगेरीलाल को सचाई दिखाई-आम आदमी के इस सपने को केंद्र सरकार ने पेटþोल के दाम बढ़ाकर फिर सपना बना दिया। लोगों का कार पर तो छोड़ो बाइक पर भी चलना मुश्किल हो गया है। अब वो दिन दूर नहीं जब कार के साथ पेटþोल खरीदने के लिए भी लोन लेना पड़ेगा। आम आदमी सपने देखता नहीं, उसे सपने दिखाए जाते हैं। चुनाव से पहले नेता और लूटने से पहले पूंजीपति अकसर लुभावने सपने दिखाकर अपने सपने पूरे करते हैं। मुंगेरीलाल नहीं माने और बोले-ओफ! सपने प्रायः दो प्रकार के होते हैं। एक वो जो पूरे हो जाते हैं; दूसरे वो जो पूरे नहीं होते हैं। अब देखो हर युवा शादी से पहले जैसे अपने जीवनसाथी के सपने देखता है उसे वैसा ही जीवनसाथी मिलता है। इससे खुश होकर लोग अक्सर अपने बेटे का नाम स्वप्निल और बेटी का नाम सपना रख लेते हैं। मैंने फिर आइना दिखाने की कोशिश की-शादी के बाद ही लोगों को सपने की असलियत का पता चलता है, आटे-दाल का भाव मालूम होता है। जब सुबह से शाम तक आफिस में बॉस की और बाद में पत्नी की डांट सुनने को मिलती है तब बैचलर लाइफ की ही याद आती है। सपनों पर मेरे अनुभवों से गुस्साकर मुंगेरीलाल हतोत्साहित हो गये। उन्हें लगने लगा कि शायद हर बार की तरह इस बार भी उनका यह सपना हसीन बनकर न रह जाए। लेकिन हम कामना करते हैं कि यह सपना पूरा न सही तो थोड़ा ही पूरा हो।
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